चालुक्य वंश

चालुक्य वंश

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चालुक्यों की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विवादास्पद है वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में इन्हें ‘शूलिक’ जाति का माना गया है जबकि पृथ्वीराजरासो में इनकी उत्पति आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से बतायी गयी है ‘विक्रमांकदेवचरित’ में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है इतिहासविद् ‘विन्सेण्ट ए. स्मिथ’ इन्हें विदेशी मानते हैं ‘एफ. फ्लीट’ तथा ‘के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री’ ने इस वंश का नाम ‘चलक्य’ बताया है ‘आर.जी. भण्डारकरे’ ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम ‘चालुक्य’ का उल्लेख किया है ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है इस प्रकार चालुक्य नरेशों की वंश एवं उत्पत्ति का कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिलता है।

चालुक्य राजाओं की मुख्यतः तीन शाखाएँ थी
1.) कल्याणी के चालुक्य (पश्चिमी शाखा)
2.)वातापी / बादामी के चालुक्य (मूल शाखा)
3.) वेंगी के चालुक्य (पूर्वी शाखा)

बादामी के चालुक्य 

पुलकेशिन प्रथम चालुक्य वंश का प्रथम वास्तविक शासक था चालुक्यों की यह शाखा मुख्य शाखा थी चालुक्य नरेशों की पूर्ण उपाधि सत्याश्रय श्री पृथिवीवल्लभ महाराजाधिराज परमेश्वर भट्टारक थी इसमें से परमेश्वर का सर्वप्रथम उपयोग हर्षवर्धन पर पुलकेशिन् द्वितीय की विजय के बाद हुआ और महाराजाधिराज तथा भट्टारक सर्वप्रथम विक्रमादित्य प्रथम के समय प्रयुक्त हुए राजवंश के योग्य व्यक्तियों को राज्य में अधिकार के पदों पर नियुक्त किया जाता था राज्य में रानियों का महतव भी नगण्य नहीं होता था विजित प्रदेश के शासकों को विजेता की अधीनता स्वीकार कर लेने पर शासन पर अधिकार फिर से प्राप्त हो जाता था अभिलेखों में सामंत और महत्तर के अतिरिक्त विषयपति, देशधिपति, महासांधिविग्रहिक, गामुंड, ग्रामभोगिक और करण के उल्लेख मिलते हैं राज्य राष्ट्र, विषय, नाडु और ग्रामों में विभक्त था राज्य के करों में निधि, उपनिधि, क्लृप्त, उद्रंग और उपरिकर के अतिरिक्त मारुंच, आदित्युंच, उचमन्न और मरुपन्न आदि स्थानीय करों के उल्लेख हैं मकानों और उत्सवों पर भी कर था व्यापारी संघ स्वयं अपने ऊपर भी कर लगाया करते थे चालुक्यों को सेना संगठित और शाक्तिशाली थी इसका उल्लेख युवानच्वां ने किया है और इसका समर्थन चालुक्यों की विजयों से, विशेष रूप से हर्ष पर सिद्ध होता है उसका कहना है कि पराजित सेनापति को कोई दंड नहीं दिया जाता, केवल उसे स्त्रियों के वस्त्र पहनने पड़ते हैं चालुक्यों की नौसेना की शक्ति भी नगण्य नहीं थी।

कल्याणी के चालुक्य 

इनके राजचिह्रों में मयूरध्वज भी था इनका पूर्ण विरुद था- समस्त भुवनाश्रय श्रीपृथिवीवल्लभ महाराजाधिराज परमेश्वर परमभट्टारक सत्याश्रयकुलतिलक चालुक्याभरण श्रीमत् -जिसके अंत में मल्ल अंतवाली राजा की विशिष्ट उपाधि होती थी राजवंश के व्यक्तियों को विभिन्न प्रदेशों के करों का भाग भुक्ति के रूप में मिलता था युवराज को राज्य के दो प्रमुख प्रांतों का शासन दिया जाता था सामंतों के अभिलेखों में उनके अधिपति के वंशावली के बाद “तत्पाद पद्मोपजीवि” के साथ उनका स्वयं का उल्लेख होता था उनके अभिलेख में राज्य की उत्तरोत्तर अभिवृद्धि और आचंद्रार्क-स्थायित्व सूचक शब्दों का अभाव होता था स्त्रियों को भी प्रांत और दूसरे प्रादेशिक विभाजनों का शासन दे दिया जाता था चालुक्यों के अभिलेखों में कई राजगुरुओं के उल्लेख हैं राज्य के वैभव के प्रदर्शन की भावना बढ़ रही थी इसी के साथ शासनव्यवस्था की जटिलता बढ़ रही थी।

चालुक्य वंश 

जयसिंह ने वातापी के चालुक्य वंश की स्थापना की जिसकी राजधानी वातापी (बीजापुर के निकट) थी इस वंश के प्रमुख शासक थे-पुलकेशिन प्रथम, कीर्तिवर्मन, पुलकेशिन द्वितीय, विक्रमादित्य, विनयादित्य एवं विजयादित्य इनमें सबसे प्रतापी राजा पुलकेशिन द्वितीय था
महाकूट स्तंभ लेख से प्रमाणित होता है कि पुलकेशिन द्वितीय बहु सुवर्ण एवं अग्निष्टोम यज्ञ सम्पन्न करवाया था जिनेन्द्र का मेगुती मंदिर पुलकेशिन द्वितीय ने बनवाया था
पुलकेशिन द्वितीय ने हर्षवर्द्धन को हराकर परमेश्वर की उपाधि धारण की थी इसने ‘दक्षिणापथेश्वर’ की उपाधि भी धारण की थी।
पल्लववंशी शासक नरसिंह वर्मन प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय को लगभग 642 ई0 में परास्त किया और उसकी राजधानी बादामी पर अधिकार कर लिया संभवतः इसी युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय मारा गया इसी विजय के बाद नरसिंहवर्मन ने वातापिकोड की उपाधि धारण की
एहोल अभिलेख का संबंध पुलकेशिन द्वितीय से है (लेखक-रविकीर्ति) अजन्ता के एक गुहाचित्र में फारसी दूत-मंडल को स्वागत करते हुए पुलकेशिन द्वितीय को दिखाया गया है वातापी का निर्माणकर्ता कीर्तिवर्मन को माना जाता है।
मालवा को जीतने के बाद विनयादित्य ने सकलोत्तरपथनाथ की उपाधि धारण की।
विक्रमादित्य द्वितीय के शासनकाल में ही दक्कन में अरबों ने आक्रमण किया इस आक्रमण का मुकाबला विक्रमादित्य के भतीजे पुलकेशी ने किया इस अभियान की सफलता पर विक्रमादित्य द्वितीय ने इसे अवनिजनाश्रय की उपाधि प्रदान की।
विक्रमादित्य द्वितीय की प्रथम पत्नी लोकमहादेवी ने पट्दकल में विरूपाक्षमहादेव मंदिर तथा उसकी दूसरी पत्नी त्रैलोक्य देवी ने त्रैलोकेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।
इस वंश का अंतिम राजा कीर्तिवर्मन द्वितीय था इसे इसके सामंत दन्तिदुर्ग ने परास्त कर एक नये वंश (राष्ट्रकूट वंश) की स्थापना की।

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