जाट वंश की वंशावली

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भारत पर विदेशी हमलावरों के हमले होते रहे हैं अपनी जमीन की लड़ाई जाटों ने अपनी जान की बाजी लगाकर लड़ी है इस लड़ाई में जाटनियों का सहयोग केवल घायलों के मरहम-पट्टी करना नहीं रहा बल्कि पति-पत्नी एक ही कमरबंध से अपने आप को पीठ के बल बांधकर युद्ध करते थे सामने के वार पति बचाता था और पीछे के पत्नी इतिहास गवाह है कि जाट के जीवन-मरण में महिला का योगदान बराबरी का नहीं तो उससे कम भी नहीं रहा लेकिन इसके बावजूद भी जाटों के लिए आज यह शर्म की बात है कि जाट बाहुल्य क्षेत्रों में पुरुषों के मुकाबले में स्त्री कम होती जा रही हैं यह लिंग-भेद जाटों के गौरव में सबसे बड़ा कलंक है यह मुद्दा यहीं पर खत्म नहीं होता बल्कि ‘सगोत्र प्रेम विवाह’ के जानकारी में आने पर तो ऑनर किलिंग जैसी शर्मनाक वारदातें सामने आती रहती हैं।

जाट शब्द की व्युत्पत्ति 

जाट शब्द का निर्माण संस्कृत के ज्ञात शब्द से हुआ है अथवा यों कहिये की यह ज्ञात शब्द का अपभ्रंश है लगभग 1450 वर्ष ई० पूर्व में अथवा महाभारत काल में भारत में अराजकता का व्यापक प्रभाव था यह चर्म सीमा को लाँघ चुका था उत्तरी भारत में साम्राज्यवादी शासकों ने प्रजा को असह्य विपदा में डाल रखा था इस स्थिति को देखकर कृष्ण ने अग्रज बलराम की सहायता से कंस को समाप्त कर उग्रसेन को मथुरा का शासक नियुक्त किया कृष्ण ने साम्राज्यवादी शासकों से संघर्ष करने हेतु एक संघ का निर्माण किया उस समय यादवों के अनेक कुल थे किंतु सर्व प्रथम उन्होंने अन्धक और वृष्नी कुलों का ही संघ बनाया संघ के सदस्य आपस में सम्बन्धी होते थे इसी कारण उस संघ का नाम ज्ञाति-संघ रखा गया
ठाकुर देशराज लिखते हैं कि महाभारत युद्ध के पश्चात् राजनैतिक संघर्ष हुआ जिसके कारण पांडवों को हस्तिनापुर तथा यादवों को द्वारिका छोड़ना पड़ा ये लोग भारत से बाहर ईरान, अफगानिस्तान अरब और तुर्किस्तान देशों में फ़ैल गए चंद्रवंशी क्षत्रिय जो यादव नाम से अधिक प्रसिद्ध थे वे ईरान से लेकर सिंध पंजाब, सौराष्ट्र, मध्य भारत और राजस्थान में फ़ैल गए पूर्व-उत्तर में ये लोग कश्मीर, नेपाल, बिहार तक फैले यही नहीं मंगोल देश में भी जा पहुंचे कहा जाता है कि पांडव साइबेरिया में पहुंचे और वहां वज्रपुर आबाद किया यूनान वाले हरक्यूलीज की संतान मानते हैं और इस भांति अपने को कृष्ण तथा बलदेव की संतान बताते हैं चीन के निवासी भी अपने को भारतीय आर्यों की संतान मानते हैं इससे आर्यों को महाभारत के बाद विदेशों में जाना अवश्य पाया जाता है ये वही लोग थे जो पीछे से शक, पल्लव, कुषाण, यूची, हूण, गूजर आदि नामों से भारत में आते समय पुकारे जाते हैं।

राजनीति में जाटों का प्रभाव 

ब्रज की समकालीन राजनीति में जाट शक्तिशाली बन कर उभरे जाट नेताओं ने इस समय में ब्रज में अनेक जगहों पर जैसे सिनसिनी, डीग, भरतपुर, मुरसान और हाथरस जैसे कई राज्यों को स्थापित किया इन राजाओं में डीग−भरतपुर के राजा महत्त्वपूर्ण हैं इन राजाओं ने ब्रज का गौरव बढ़ाया, इन्हें ‘ब्रजेन्द्र’ अथवा ‘ब्रजराज’ भी कहा गया ब्रज के इतिहास में कृष्ण अलबेरूनी ने कृष्ण को जाट ही बताया है के पश्चात् जिन कुछ हिन्दू राजाओं ने शासन किया , उनमें डीग और भरतपुर के राजा विशेष थे इन राजाओं ने लगभग सौ सालों तक ब्रजमंडल के एक बड़े भाग पर राज्य किया इन जाट शासकों में महाराजा सूरजमल शासनकाल सन् 1755 से सन् 1763 तक और उनके पुत्र जवाहर सिंह शासन काल सन् 1763 से सन् 1768 तक ब्रज के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध हैं ।

जाट संघ से अन्य संगठनों की उत्पति 

जाट संघ में भारत वर्ष के अधिकाधिक क्षत्रिय शामिल हो गए थे जाट का अर्थ भी यही है कि जिस जाति में बहुत सी ताकतें एकजाई हों यानि शामिल हों एक चित हों ऐसे ही समूह को जाट कहते हैं जाट संघ के पश्चात् अन्य अलग-अलग संगठन बने जैसे अहीर गूजर, मराठा तथा राजपूत ये सभी इसी प्रकार के संघ थे जैसा जाट संघ था राजपूत जाति का संगठन बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम करने के लिए ही पौराणिक ब्राहमणों ने तैयार किया था बौद्धधर्म से पहले राजपूत नामका कोई वर्ग या समाज न था।

जाटों का शासन 

इन जाट राजाओं ने ब्रज में हिन्दू शासन को स्थापित किया इनकी राजधानी पहले डीग थी फिर भरतपुर बनायी गयी महाराजा सूरजमल और उनके बेटे जवाहर सिंह के समय में जाट राज्य बहुत फैला, लेकिन धीरे धीरे वह घटता गया भरतपुर, मथुरा और उसके आसपास अंग्रेज़ों के शासन से पहले जाट बहुत प्रभावशाली थे और अपने राज्य के सम्पन्न स्वामी थे वे कर और लगान वसूलते थे और अपने सिक्के चलाते थे उनकी टकसाल डीग, भरतपुर, मथुरा और वृन्दावन के अतिरिक्त आगरा और इटावा में भी थीं जाट राजाओं के सिक्के अंग्रेज़ों के शासन काल में भी भरतपुर राज्य के अलावा मथुरा मंडल में प्रचलित थे ।

जाट जनसंख्या 

वर्ष 1931 के बाद भारत में जाति आधारित जनगणना नहीं की गयी है परन्तु जाट इतिहासकार कानूनगो के अनुसार वर्ष 1925 में जाट जनसंख्या 90 लाख थी जो वर्त्तमान में करीब 3 करोड़ है तथा धर्मवार विवरण इसप्रकार है
धर्म जाट जनसंख्या %
1.) हिन्दू 47 %
2.) इस्लाम 33 %
3.) सिख 20 %

Conclusion:- दोस्तों आज के इस आर्टिकल में हमने जाट वंश की वंशावली के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। इसलिए हम उम्मीद करते हैं, कि आपको आज का यह आर्टिकल आवश्यक पसंद आया होगा, और आज के इस आर्टिकल से आपको अवश्य कुछ मदद मिली होगी। इस आर्टिकल के बारे में आपकी कोई भी राय है, तो आप हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताएं।

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