जातिवाद दूर करने के उपाय

जातिवाद दूर करने के उपाय – भारत में जातिवाद का मुख्य कारण क्या है, जातिवाद को बढ़ावा देने वाले कारक कौन हैं, भारत में जातियां कैसे बनी, सबसे पहले कौन सी जाति की उत्पत्ति हुई, जातिवाद पर शायरी, जातिवाद पर निबंध, जातिवाद के लाभ, जातिवाद के परिणाम, जातिवाद दूर करने के उपाय, जातिवाद के दोष, जाति प्रथा एक अभिशाप है,

जातिवाद के विकास के कारण
1. भारतीय दर्शन –
भारतीय दर्शन एवं इस दर्शन से सम्बन्धित विभिन्न सिद्धांत जैसे पुनर्जन्म, कर्म का सिद्धांत आदि इस बात पर अधिक बल देते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना-अपना कर्म करना चाहिये और अपने को कर्म में रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिये। इन्हीं कर्मों और संस्कारों के फलस्वरूप ही उसे मोक्ष प्राप्त होगा। इस कर्म सिद्धांत ने एक तरफ व्यक्ति को भाग्यवादी बनाया और दूसरी तरफ उसे अपनी जाति के कर्मों के घेरे में जकड़ रखा जो आगे चलकर जातिवाद में परिवर्तित हुआ।

2. परम्परात्मक व्यवसाय –
विभिन्न जातियों की उत्पत्ति में विभिन्न व्यवसायों का विशेष हाथ है। विभिन्न व्यवसायों में कार्य करने वाले व्यक्तियों में एक संगठन और एक जातीय भावना भी पायी जाती है। वह अपने व्यवसाय की बारीक बातों को किसी दूसरे व्यवसाय वाली जाति के व्यक्ति को नहीं बतलाते। इसी प्रकार अन्य जातियों के मध्य भी अपने व्यवसाय के प्रति यह भावना होती है। इस भावना ने जातिवाद को प्रोत्साहन दिया। कारण प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति से सम्बन्धित व्यवसाय को अधिक महत्व देने लगा या उन्हें हेय समझने लगा।

3. मुस्लिम एवं ईसाई सम्प्रदाय की नीति –
मुस्लिम एवं ईसाई सम्प्रदायों ने अपनी-अपनी जाति के व्यक्तियों को अधिक से अधिक सुविधायें प्रदान की। यही नहीं, अपने इस्लाम और ईसाई धर्म को फैलाने के लिए उन्होंने अन्य जातियों के व्यक्तियों को नौकरी और विवाह का प्रोत्साहन भी दिया। इन कार्यों का परिणाम यह हुआ कि हिन्दू सम्प्रदाय में भी जातीयता की भावना जागृत हुई। अपने धर्म की रक्षा के लिए यहाँ के विद्वानों और संन्यासियों ने आंदोलन प्रारंभ किया। इससे हिन्दू धर्म से सम्बन्धित अन्य जातियों में भी जातिवाद की भावना का प्रसार हुआ।

4. जातीयता की तीव्र भावना –
जातीयता की तीव्र भावना ने भारतवर्ष में जातिवाद को विकसित करने में काफी सहायता की है। ऊँचे-नीचे वर्ण, छोटी जातियों और इनसे सम्बन्धित धर्म विश्वास, कर्म, व्यवसाय, सामाजिक, आर्थिक स्थिति ने किसी एक जाति को समाज में ऊँचा पद और स्थिति प्रदान की और किसी दूसरे जाति को निम्न। इस ऊँचे और नीचे के फासले ने अपनी-अपनी जाति की ओर व्यक्ति को अधिक निष्ठा बढ़ाई जिसका परिणाम जातिवाद के रूप में प्रस्फुटित हुआ।

5. विभिन्न संस्थाओं का संगठन –
जातिवाद जैसे-जैसे प्रगति करता गया वैसे-वैसे इसकी जड़ें और शक्तिशाली होती गई। इसके लिए विभिन्न प्रकार के संगठनों का जन्म हुआ। विभिन्न प्रकार के संघों, परिषदों एवं संस्थाओं की स्थापनायें की जाने लगीं। यह संगठन विशेष जाति से सम्बन्धित होती हैं। इस प्रकार की संस्थाओं ने जातिवाद को फैलाने में काफी सहायता की प्रत्येक जाति जो थोड़ी सी भी शक्तिशाली बने कि उसने अपनी जाति की एक संस्था स्थापित की जिसका उद्देश्य था केवल अपनी ही जाति के व्यक्तियों की उन्नति और कल्याण करना।

6. राजनीति का कुचक्र –
भारतीय राजनीति के विभिन्न दल वोट बैंक बनाने के लिए जातिगत राजनीति को प्रोत्साहित कर रहे हैं। निम्न और सवर्ण जातियों के मध्य ध्रुवीकरण हो रहा है। सत्ता की राजनीति ने जातिवाद को काफी बढ़ाया है।

7. औद्योगिक विकास –
उद्योगों के विकास से संयुक्त परिवार का विघटन हुआ। परिवार के लोग विभिन्न औद्योगिक नगरों में जीविका अर्जित करने के हेतु एकत्रित होने लगे। व्यक्ति एकाकी जीवन व्यतीत करता है। उसकी जाति के व्यक्ति भी परिचित नहीं होते। अस्तु उन्होंने अपनी जाति का संगठन बनाना प्रारम्भ किया। जहाँ एक जाति के व्यक्ति एकत्रित होते हैं। इन सबका परिणाम यह हुआ कि नौकरियों में नियुक्तियाँ जाति के आधार पर होने लगी। इससे जातिवाद में वृद्धि हुई।

8. धार्मिक संस्थाएँ एवं जातिवाद –
विभिन्न धर्मो के गुरुओं ने अपने-अपने धर्म की प्रशंसा की और – अन्य धर्मों की आलोचना की। धर्म के गुरुओं ने मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, मठ, आश्रम आदि की स्थापना, कर जातिवाद को बढ़ाया। इन संस्थाओं ने अपने धर्म का प्रचार एवं प्रसार किया। विभिन्न संस्थाओं के मध्य एक विभिन्नता की भावना का जन्म हुआ जो केवल अपनी संस्था के व्यक्तियों की ही प्रशंसा करता है और अन्य संस्थाओं की आलोचना करता है।

9. विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध –
जाति-प्रथा के अन्तर्गत विवाह सम्बन्धी कड़े नियम हैं। इन नियमों से प्रत्येक जाति का व्यक्ति बँधा हुआ है। प्रत्येक जाति का एक दायरा बन गया है। वह उस दायरे में ही विवाह आदि करता है। इस दायरे में रहने वाले व्यक्ति केवल अपनी जाति की भलाई की बात सोचते हैं। इसे जातिवाद की पराकाष्ठा ही कहेंगे।

10. हरिजन की चेतना का प्रभाव –
जातिवाद की चेतना का प्रभाव हरिजनों पर भी अत्यधिक पड़ा। यह वर्ण ऐसा रहा है जिसका शोषण, आदिकाल से हुआ है। समाज के तीन वर्णों ने इन्हें मनुष्य माना ही नहीं। मनुष्य वर्ग से सदैव इन्हें अलग रखा गया। शूद्र वर्ण आज एक सशक्त संगठन एवं संघ का रूप ले रहा है जो अपनी जाति के व्यक्तियों की उन्नति के लिए सोचता है और कार्य करता है।

11. अपनी जाति की उन्नति का उद्देश्य –
नगरों में जातिवाद इसलिए भी बढ़ रहा है कि प्रत्येक जाति का वह व्यक्ति यह चाहता है कि उसकी जांति के व्यक्तियों की सामाजिक स्थिति ऊँची हो। इसके लिए वह जातीय संघ बनाता है। अपनी जाति के व्यक्तियों को नौकरी दिलाने के लिए प्रयत्न करता है या उसकी उन्नति के लिए हर सम्भव उपाय करता है।

12. शिक्षा संस्थाएँ –
जहाँ शिक्षा ने व्यक्तियों का बौद्धिक विकास किया, वहाँ उसने व्यक्तियों के मस्तिष्क को संकुचित भी किया। शिक्षा संस्थाओं में जाति के अनुसार नियुक्तियाँ होती हैं। विद्यार्थियों को प्रवेश सुविधाएँ, छात्रवृत्ति आदि जाति के अनुसार दी जाती है। इस प्रकार के कार्यों से अन्य जातियों में असंतोष बढ़ता है और जातीय भावना का प्रसार होता है।

13. पुरोहितवाद –
पुरोहितवाद ने जातिवाद को प्रोत्साहित किया। ब्राह्मणों ने अपने हित और स्वार्थ के लिए विभिन्न स्मृतियों, पुराणों एवं उपनिषदों की रचना की। इन पुस्तकों में ब्राह्मणों के गुणगान गाए और निम्न जातियों की उपेक्षा की गई व उनका शोषण भी किया गया। व्यक्तियों ने पुरोहितों पर आक्रमण किया। विभिन्न जातियों ने अपनी उन्नति और उत्थान के लिए जातीय संघ बनाए। इस तरह पुरोहितवाद ने जातिवाद को बढ़ाया।

14. प्रचार और यातायात के साधनों में वृद्धि –
अतीत में प्रचार और यातायात के साधनों की सुविधाएँ नहीं थीं। अस्तु एक जाति के व्यक्तियों का संगठन विस्तृत रूप में नहीं बन पाता था । आधुनिक युग में टेलीविजन से लेकर हवाई जहाज तक ऐसे साधन उपलब्ध हो गए। जिनके द्वारा अपनी जाति के व्यक्तियों का संगठन विभिन्न नगरों में स्थापित किया जाता है। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी जातिवाद का प्रचार हो रहा है।

सामाजिक स्तर पर जातिवाद –
जातिवाद के कारण समाज का 2 हिस्सों में बंटना ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इसकी प्रभाविता तब सुनिश्चित होने लगी, जब इन 2 वर्गों में से एक को शक्ति हासिल होती गई, वहीँ दूसरे वर्ग पर शोषण का प्रभाव बढ़ने लगा. इस कारण जहाँ एक जाति उन्नत और समृद्ध होती गयी वहीँ दूसरी जाति का पतन होने लगा और विकास के सभी मार्ग बंद होने लगे. आर.एन.शर्मा के अनुसार “जातिवाद किसी व्यक्ति की अपनी जाति के प्रति अंध-श्रद्धा हैं जो की दूसरी जातियों के हितों की परवाह नहीं करती. और अपनी जाति के सामजिक,आर्थिक,राजनीतिक और अन्य जरूरतों को पूरी करने का ही ध्यान रखती हैं.”

राजनीति में जातिवाद –
जातीवाद जब तक सामाजिक स्तर पर था, तब तक इससे जुडी समस्याए निश्चित और सीमित थी, लेकिन राजनीति में जातिवाद का प्रभाव पड़ने पर देश बंटने लगा. जाति निर्धारित वोटों की गिनती ने समाज को और बाँट दिया. इसका उपयोग द्वेष और अलगाव-वाद को बढ़ावा देने के लिए किया जाने लगा. और सभी असामाजिक गतिविधियां फैलने लगी, क्योंकि जाति का ठप्पा वोटों और नोटों के सहारे किसी भी अपराधी को बचकर निकलने में मदद करने लगा. इस तरह जैसे जैसे राजनेतिक समीकरण जाति आधारित बनते गए वैसे-वैसे संविधान आधारित लोकतंत्र की नींव हिलने लगी

जातिवाद के चिन्ह –
जातिवाद का विचार जातियों-और उपजातियों की ईमानदारी और समपर्ण की महत्ता को दिखाता हैं. यह या तो अन्य जातियों के हितों पर ध्यान नहीं देता या परवाह नहीं करता.किसी भी जातिवादी के लिए “मेरी जाति का आदमी और केवल मेरी जाति ही सही या गलत हैं” का सिद्धांत ही सब कुछ होता है. जातिवादी लोग लोकतंत्र के खिलाफ होते है

जातिवाद केवल एक पक्ष को न्याय दे सकता है,जो की उसकी जाति के लिए लाभदायक हो फिर चाहे वो मानवता की कोई भी सीमा का उल्लंघन करता हो.जातिवाद किसी भी देश के निर्माण के लिए और प्रगति के लिए बहुत ही बड़ी बाधा हैं, और यह संविधान के विपरीत भी हैं

जातिवाद में शोषण की संभावना बहुत बढ़ जाती हैं इसमें कोई एक जाति ऊँची तो कोई एक जाति नीची बन जाती है,और इस तरह से कम शक्ति वाली जाति का शोषण होने लगता है. और इस उंच-नीच के निर्धारण के लिए कोई तय क्षेत्र भी नहीं होता.जैसे जाति आधारित वर्गीकरण के लिए पैसा,विद्या और कर्म अब तक मुख्य कारण रहे हैं.जिसमें ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य स्वत: सवर्ण में आ गए और बाकि सभी जातियां इनके शोषण का शिकार होने लगी

जातिवाद के कारण –
अपनी जाति के सम्मान की रक्षा करना: कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के लिए जन्म से ही गौरवान्वित रहता हैं, इस कारण अपनी जाति के प्रति समर्पण भाव में वह इतना आत्म-लीन हो जाते हैं कि मानवता की सभी मर्यादा तक भूल जाते है, और यही वर्ग शोषक का वर्ग बन जाता है जबकि शोषित वर्ग अपने दिए गये कर्म के साथ ही जीवन यापन करके हमेशा के लिए दबा रहना चाहता है

अंत:जातिय विवाह :- किसी भी समुदाय में ये परम्परा की शादी अपने समूह से बाहर नहीं करनी हैं, जातिवाद को और प्रबलता प्रदान करती है. इसके कारण सिर्फ सामजिक स्तर पर ही सन्कुचन नहीं आता बल्कि किसी जाति का जीन पूल भी सिमटकर रह जाता है और जीन्स में विविधताए नहीं आ पाती

शहरीकरण :- गाँवों में रोजगार की कमी के चलते काफी जनसंख्या शहरों में बसने लगी,लेकिन वहां जातिय विभिन्नता के चलते जीवन-यापन और संवाद मुश्किल होने लगा. ऐसे जातिवाद को और भी बल मिला, और वो लोग जो भिन्न-भिन्न गाँवों के थे, एक ही जाति के होने के कारण साथ-साथ रहने लगे

सामजिक दूरी:- वो जातियां जो खुदको दूसरों से बेहतर समझती थी वो अन्य जातियों से दूरी रखने लगी,जिस कारण छुआ-छूत और सामाजिक असमानता बढ़ने लगी और जातिवाद ना केवल इन जातियों में बल्कि उस वर्ग में भी प्रबल होने लगा जो इस असमानता का शिकार हो रही थी

अशिक्षा और अवसरों की कमी :- जिन जातियों ने शक्ति हासिल कर ली वो शिक्षित होती चली गयी लेकिन जिनके पास संसाधनों की कमी थी उस पर से उच्च जातियों का अत्याचार भी होता था,वो भी अपनी जाति और जातिवाद का महत्व समझने लगी

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