मराठा वंश की वंशावली

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मराठा लोगों को ‘महरट्टा’ या ‘महरट्टी’ भी कहा जाता है। भारत के वे प्रमुख लोग, जो इतिहास में ‘क्षेत्र रक्षक योद्धा’ और हिन्दू धर्म के समर्थक के रूप में विख्यात हैं, इनका गृहक्षेत्र आज का मराठी भाषी क्षेत्र महाराष्ट्र राज्य है, जिसका पश्चिमी क्षेत्र समुद्र तट के किनारे मुंबई (भूतपूर्व बंबई) से गोवा तक और आंतरिक क्षेत्र पूर्व में लगभग 160 किमी. नागपुर तक फैला हुआ था। मराठा शब्द का तीन मिलते-जुलते अर्थों में उपयोग होता है-मराठी भाषी क्षेत्र में इससे एकमात्र प्रभुत्वशाली मराठा जाति, या मराठों और कुंभी जाति के एक समूह का बोध होता है। महाराष्ट्र के बाहर मोटे तौर पर इससे समूची क्षेत्रीय मराठी भाषी आबादी का बोध होता है, जिसकी संख्या लगभग 6.5 करोड़ है।

वर्तमान में मराठा शव्द के प्रकार 

वर्तमान में मराठा शव्द तीन प्रकार से प्रयोग किया जाता है | मराठी भाषा बोलने वाले मराठे, महाराष्ट् के रहने वाले मराठे, एक जाति जो अपने को 96 कुली मराठा कहलाती है, के रुप मे सम्बोधन किया जाता है | इस शब्द को समझने के लिए हमें इतिहास में जाना पडेगा | मानव असभ्य से सभ्य हुआ तो सबसे पहले उसने पशुपालन किया और कालान्तर में उसने कृषि कर्म को अपनाया | वे पशुधन पालने के कारण धनगर और कृषि कार्य करने के कारण कुणबी कहलाये | यही दो सबसे प्राचीन कबीले थे| आठ सौ साल मुस्लिम सुल्तानों, नवाबों व बादशाहों का राज रहा और उपके अत्याचारों के काले कारनामें इतिहास में भरे पडें है | उनके अत्याचारों से त्रस्त भारतीय लोगों ने अपने स्वाभिमान व धर्म की रक्षा के लिए सुदूर दक्षिण में जंगलों और पहाडों में जाकर शरण ली तथा उन्होंने भी पशुधन पालन व कृषि कार्य को अपनाया तथा वे भी धनगर और कुणबी कहलाने लगे | जिससे मूल धनगर और कुणबी वंशों में वृद्वि हुई | उन्हीं दो कबीलों से अनेक प्रसिद्व राजवंशों का उदय भी हुआ |

सातारा वंश 

> छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680) माता-जीजा बाई
> छत्रपति सम्भाजी महाराज (1680-1689)
> छत्रपति राजाराम प्रथम (1689-1700)
> महाराणी ताराबाई (1700-1707)
> छत्रपति शाहू (1707-1749) उर्फ शिवाजी द्वितीय, छत्रपति संभाजी का बेटा
> छत्रपति रामराज (छत्रपति राजाराम और महाराणी ताराबाई का पौत्र)
> छत्रपति शाहू द्वितीय(1777-1808)

धर्म सुधारकों का योगदान 

16वीं एवं 17वीं शताब्दी में भारत में हुए धार्मिक आन्दोलनों ने महाराष्ट्र में तुकाराम, रामदास, वामन पंडित एवं एकनाथ जैसे धर्म सुधारकों को जन्म दिया। इन सबके उपदेशों ने मराठों को एकता के सूत्र में बांधने एवं देशभक्ति की भावना जगाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इन धर्मोंपदेश द्वारा महाराष्ट्र की भाषा ‘मराठी’ को अपने उपदेशों का माध्यम बनाने के कारण मराठी साहित्य का विकास हुआ। भाषा एवं साहित्य के विकास ने भी मराठों के उत्कर्ष में भूमिका निभायी।

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