शूद्र गोत्र लिस्ट

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शूद्र गोत्र लिस्ट

अस्मितावादी वैचारिकी के भीतर दलित-पिछड़ीं जातियां हिंदू दायरे और उसकी शब्दावलियों से इतर अपनी पहचान सृर्जित करने की पहलक़दमियों की ओर बढ़ रही हैं। ब्राह्मणों ने अपने धर्म-शास्त्रों के भीतर दलितों और पिछड़ीं जातियों को ‘शूद्र’ और ‘आदिशूद्र’ की संज्ञा दी है। इस प्रकार, दलितों और पिछड़ों को हिंदू दायरे से अलग देखने की कवायद आज की नहीं, बल्कि बहुत पहले से चली आ रही है।

बीसवीं सदी के महान विचारक और विलक्षण सिद्धांतकार स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ (1879-1933) ने ब्राह्मणशाही के द्वारा दी गयी– शूद्र, अतिशूद्र, अन्त्येय, अस्पृश्य, और ‘अछूत’ वाली पहचान को स्वीकार नहीं किया। स्वामी अछूतानंद का मत था कि दलित-पिछड़ी जातियों के लोग अपनी पहचान में आदिधर्मी-आदिहिंदू अर्थात मूलनिवासी हैं। सन् 1922 में स्वामी अछूतानंद ने आदिहिंदू सभा की स्थापना करते हुए कहा कि “भाइयो! हम लोग भारत के प्राचीन निवासी ‘आदिहिंदू’ हैं। आर्य-द्विजातीय सब विदेशी हैं। इन लोगों ने हमें नीच, अछूत और गुलाम बना रखा है। हमें इन लोगों के फैलाये हुए भ्रमजाल से निकलकर अपने पैरों पर खड़े होकर अपने सारे मुल्की हकों को हासिल करना चाहिए।”

सन् 1921-22 में असहयोग-आंदोलन चरम पर था। उसी समय स्वामी अछूतानंद ने आदिहिंदू-आंदोलन के हवाले से बहुजनों के मुल्की हक और पहचान के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। औपनिवेशिक भारत में उभरे स्वामी अछूतानंद के आदिहिंदू-आंदोलन ने जब दलित-पिछड़ी जातियों को हिंदू दायरे से अलग करने की क़वायद शुरू की तो हिंदू सुधारकों और लेखकों ने उनके विरूद्ध मोर्चा खोल दिया था। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि रामनारायण ‘यादवेंदु’ को स्वामी अछूतानंद कि यह क़वायद रास नहीं आई। उन्होंने स्वामी अछूतानंद और उनके आंदोलन के विरुद्ध माधुरी पत्रिका (1930) में लेख लिखा। इस लेख में रामनारायण ‘यादवेंदु’ ने स्वामी अछूतानंद के आंदोलन को विचित्र आंदोलन की संज्ञा देकर हिंदुओं के लिए विनाशकारी बताया था। रामनारायण ‘यादवेंदु’ का कहना था– “आज से दो वर्ष पूर्व भारत के प्रायःसमस्त संवाद पत्रों ने एक विचित्र आंदोलन का प्रतिवाद किया था। समाचार-पत्रों के इस प्रतिवाद से ‘आंदोलन’ की प्रगति में कोई शिथिलता न आई। इसका कारण यह हो सकता है कि प्रतिवाद समुचित रूप से नहीं किया गया अथवा उसे ‘अनधिकारस्थ’ संपत्ति के भाग्य-निर्णय पर छोड़कर हिंदू-समाज ने अपने कर्तव्य-कलाप की इतिश्री समझ ली हो। अस्तु। इस विचित्र आंदोलन का नाम ‘आदिहिंदू’ है और इसके आंदोलक हैं ‘स्वामी अछूतानंद’। इनका ‘वाद’ इस प्रकार है कि भारतवर्ष की आधुनिक दलित जातियाँ यहाँ की आदि-निवासिनी हैं। विदेश से आए आर्यों ने इन आदि-निवासिनी जातियों पर आक्रमण किया और उन्हें दास बनाया। अब हमें ब्रिटिश-राज्य में सुबीता मिला है कि हम इन ‘छली-कपटी’ हिंदुओं (आर्यों) से पूरा बदला लें। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि यह वाद कुछ पाश्चात्य इतिहासज्ञों की कपोल-कल्पित एवं भ्रांत-पूर्ण आर्य-अनार्य-संग्राम के निराधार आधार पर आश्रित है।” रामनारायण ‘यादवेंदु’ ने स्वामी अछूतानंद द्वारा शूद्रों को आदि धर्मी बताएं जाने का विरोध किया। इनका कहना था कि अछूतानंद दलित जातियों को तो ‘आदिहिंदू’ मानते ही हैं, लेकिन जाटवों, यादवों, अहीर और नाइयों तक को भी अपने आदिनिवासी गल्ले में गिनतें हैं। इन्होंने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों से अपील करते हुये कहा कि स्वामी अछूतानंद के झांसे में किसी कीमत में न आयें। रामनारायण ‘यादवेंदु’ लिखतें हैं– “हम इस तर्कहीन ‘वाद’ की समाप्ति करते हुए जाटव, यादव और अहीर, विशेषतः दलित नामधारी जातियों से निवेदन करते हैं कि वे इस कुचक्र से अपनी रक्षा करें। अपने धर्म– वैदिक-हिंदू-धर्म पर आरूढ़ रहें। हम हिंदू जाति के नेताओं एवं उन्नायकों का ध्यान आकृष्ट करने का लोभ-संवरण नहीं कर सकते। उनका कर्तव्य है कि वे इस ‘सार्वजनिक संपत्ति’– दलित जातियों को सुरक्षित रक्खें।” दरअसल, रामनारायण ‘यादवेंदु’ अछूतों-पिछड़ों की समस्या समझने के बजाय स्वामी अछूतानंद को हिंदूधर्म और वेद व शास्त्र का विध्वसंक सिद्ध करने की कवायद में हिंदुत्व के बचाव में खड़े नज़र आए।

स्वामी अछूतानंद के आंदोलन से हिन्दी लेखक और संपादक भयभीत दिखाई दिए। इन लेखकों का भय था कि यदि छ: करोड़ अछूत और नौ करोड़ शूद्र (सन् 1921 की जनगणना) हिंदू धर्म से अलग हो गए तो स्वराज प्राप्त करने में उच्च श्रेणी के हिंदुओं को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। इधर, स्वामी अछूतानंद का साफ़तौर पर कहना था कि दलित-शूद्र हिंदू धर्म के अंग नहीं है। यह समाज आदिधर्मी और आदि निवासी है। स्वामी अछूतानंद कि इस घोषणा के बाद हिंदू सुधारकों और लेखकों ने अपनी पत्रिकाओं में उनके खिलाफ़ खूब हल्ला मचाया। यहाँ तक कि लाला लाजपतराय ने स्वामी अछूतानंद के आदिहिंदू-आंदोलन का विरोध कर उनके आंदोलन को महज धोखे की टठ्ठी बता डाला। विद्यालंकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने ब्राह्मण सर्वस्व पत्रिका में स्वामी अछूतानंद के आदिहिंदू-आंदोलन के विरुद्ध लेख लिखकर जमकर विरोध प्रकट किया। कन्हैयालाल मिश्र ने अपने लेख के भीतर अछूतों के इस आंदोलन की शिनाख्त हिंदू धर्म के भयंकर विनाश के रुप में कर डाली। इनका कहना था कि यदि शीघ्र स्वामी अछूतानंद के आंदोलन का संहार नहीं किया गया तो अछूत हिंदुओं के खिलाफ़ भयंकर क्रांति कर डालेंगे। विद्यालंकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने हिंदुओं की तरफ चिंता प्रकट करते हुए लिखा– “इन आन्दोलनों में इतना फिर भी अच्छा है, कि ये लोग हिंदू ही रहना चाहते हैं, बस चाहते हैं बड़ा हिंदू बनना। परन्तु इधर कुछ दिनों से एक नया आन्दोलन चला है, यह उक्त प्रान्दालनों से अधिक भयंकर और नाशकारी है और यदि शीघ्र ही इसका दमन न किया गया तो हिंदू जाति में एक ऐसी क्रान्ति होगी कि जिसे, इच्छा रखते भी हम दबा न सकेंगे। इस आन्दोलन का अशुभ नाम है– आदिहिंदू आन्दोलन। इस आन्दोलन के संचालक अपने व्याख्यानों के द्वारा गरीब और अशिक्षित अछूतों को भड़काते हैं। उनका कहना है कि आदि काल में भारत में केवल वे ही लोग रहते थे, जिनकी इस समय अछूत (और शूद्र) संज्ञा है, अतएव ये ही भारत के आदि वासी या आदिहिंदू हैं। पूर्व काल में इनकी अवस्था बहुत अच्छी थी और भारत में इनका ही राज्य था, परन्तु आर्यों ने ईरान आदि देशों से आकर आदि हिंदुओं को जीत लिया और अपना सेवक बनाया। उन्हीं सेवकों में से कुछ को आर्यों के अत्याचार के कारण अछूत की संज्ञा मिल गई। ऊंचा कहाने वाले हिंदू ही वे विदेशी आर्य हैं। इस प्रकार अछूतों के हृदय में द्वेष-भाव उत्पन्न कर करके, उन्हें हिंदू जाति से पृथक करने की दुश्चेष्टा हो रही है।” विद्यालंकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जैसे हिंदू नहीं चाहते थे कि अछूत उच्चताभिमानी हिंदुओं के विरुद्ध गोलबंद होकर अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करें। बड़ी मजे की बात है कि बीसवीं सदी के क्रांतिकारी संपादक रामरखसिंह सहगल ने भी स्वामी अछूतानंद के आदिहिंदू-आंदोलन का जबर्दस्त विरोध किया था।

गौरतलब है कि रामरख सिंह सहगल नवजागरण काल की चर्चित पत्रिका ‘चाँद’ के संपादक और उद्भावक थे। उन्होंने इस पत्रिका के 1928 के फरवरी अंक में ‘आदिहिंदू-आंदोलन’ शीर्षक से संपादकीय लिखकर अपना विरोध प्रकट किया था।

स्वामी अछूतानंद हिंदू सुधारकों और लेखकों के संगठित विरोध से तनिक भी भयभीत नहीं हुए। वे दलितों-शूद्रों को हिंदू धर्म और उसकी शब्दावलियों से मुक्त करने के लिए आंदोलन करते रहे। 28 अप्रैल, 1933 के अमरावती में भाषण देते हुए स्वामी अछूतानंद ने कहा कि “वस्तुत: हम शूद्र, अतिशूद्र, अन्त्येय, अस्पृश्य, अछूत आदि नहीं हैं, बल्कि मूल भारतीय आदिहिंदू, आदि नेशन हैं।… हमें शूद्र और दास बनाकर हमारा निरंतर शोषण करते चले आ रहे हैं, और कर रहे हैं। ब्राह्मणी स्मृतियों में जितने कठोर विधान शूद्रों के लिए बनाए गए हैं, उतने निर्दय और क्रूर विधान कोई भी व्यस्थापक अपनी ही जातिवालों के खिलाफ़ नहीं बना सकता है।” स्वामी अछूतानंद का आंदोलन विशुद्ध रूप से सामाजिक-धार्मिक और राजनैतिक था। औपनिवेशिक भारत में उभरा यह एक ऐसा अछूत-आंदोलन था, जिसने हिंदू धर्म के परिसरों की नींव कमजोर करने में न सिर्फ अहम भूमिका निभाई बल्कि बहुजनों को हिंदू धर्म के परिसरों से बाहर निकालने की भरपूर कवायद की। इस कवायद में उन्होंने न तो वर्ण व्यवस्था के शूद्र शब्द को, और ना ही मध्यकाल व आधुनिक काल के अछूत शब्द को स्वीकार किया, बल्कि औपनिवेशिक भारत में हिंदू शब्दावलियों के इतर दलितों-शूद्रों को आदिहिंदू और आदिनेशन पहचान देने की कोशिश की थी।

अब हम इस तथ्य की ओर बढ़ते हैं कि औपनिवेशिक भारत में वर्णधारियों का नज़रिया शूद्रों के प्रति कैसा था। क्या उच्च शिक्षित हो जाने पर शूद्रों के प्रति वर्णधारियों का नज़रिया बदल जाता था? बीसवीं सदी के तीसरे दशक के शूद्रों का अनुभव कहता है कि शूद्रों के उच्च शिक्षित हो जाने पर वर्णधारी उन्हें शूद्र और अछूत ही समझते थे। बीसवीं सदी के महान सुधारक और लेखक संतराम बी.ए. ने ‘युगांतर’ पत्रिका के 1934 के अप्रैल अंक में एक उच्च शिक्षित पिछड़ी जाति के प्रिंसिपल का साक्षात्कार नुमा लेख ‘शूद्रों के आंसू’ शीर्षक से प्रकाशित किया। इस लेख में प्रिंसिपल साहब का परिचय देते हुए लिखा गया कि यह सज़्जन लंदन-विश्वविद्यालय के साहित्याचार्य और एक गवर्नमेंट कालेज में वाइस प्रिंसिपल हैं। बड़े सुसंस्कृत और सद्गृहस्थ हैं । खान-पान और रहन-सहन सब यूरोपियन ढंग का है। घर में बाल-बच्चे सब अँगरेजी बोलते हैं। इस उच्च शिक्षित प्रिंसिपल ने जातिगत भेदभाव का अनुभव साझा करते हुए कहा– “मैं अँगरेज़ों की गुलामी से उतना दुःखी नहीं हूँ जितना कि हिंदू कहलाते हुए भी खुद हिंदुओं के अत्याचार से हूँ। अँगरेज़ों की गुलामी का अनुभव तो मुझे वर्ष भर में शायद एकाध बार ही होता होगा, परन्तु उच्चवर्णी हिंदुओं के हाथों तो रोज़ ही पल-पल अपमानित होना पड़ता है।” इसके बाद प्रिंसिपल साहब ने द्विजों की समाज घातक मनोवृत्ति पर अपने विचार प्रकट करते हैं। उनका कहना था– “ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य– लोगों ने शूद्र कहलाने वाले लोगों के लिए जीना दूभर बना रक्खा है। कोई भी शूद्र हिंदू रहते हुए आत्म-सम्मान का जीवन नहीं बिता सकता। पहले तो स्कूलों में हिंदू मास्टर प्रायः सब द्विज ही होते हैं। जब कोई नाई, कहार, कुम्हार, तेली, और कुरमी आदि किसी शुद्र जाति का बालक पढ़ने जाता है तो ये लोग जल-भुन जाते हैं। उनको द्वेष पैदा होता है कि हमारे गुलाम ये नाई-कहार मी क्यों पढ़ने लगे हैं। वे उन बच्चों को बड़े अपमानजनक शब्द कह कर निरुत्साहित करते हैं। ये हत्यारे कहते हैं– “अरे नाऊ के! सुसरे जाकर हजामत बना; तुझे पढ़ना नहीं आएगा; तू यहां क्या करने आया है! ओ कहार कहीं के! जा जाकर जूठे बर्तन साफ कर। पढ़ना क्षत्रिय-ब्राह्मणों का काम है; तू साले पढ़ कर क्या लेगा?” फिर ज़रा सी भी भूल हो जाने पर ये बच्चे को उसकी जात का ताना देकर बहुत बुरी तरह से दुत्कारते हैं। नन्हे से बच्चे की आत्मा वहीं कुचली जाती है। बाल्यकाल में ही उस के कोमल हृदय पर यह बात अंकित हो जाती है कि परमेश्वर ने मुझे नीच और द्विजों का दास पैदा किया है। यदि वही भूल ब्राह्मण-क्षत्रियों के लड़कों से हो जाय तो उन्हें ये दुष्ट कभी नहीं कहते कि जाओ सुसरो, जाकर हंदे (भीख) मांगते फिरो, या बाजार में चना-चबेना बेचो; तुम्हारा यहां क्या काम? यदि कोई शूद्र बालक सौभाग्य से तीव्र बुद्धि निकल पड़े और इन विद्या-बुद्धि के ठेकेदारों को परीक्षा में पछाड़ दे तो फिर ये ताने से कहते हैं-अजी, परीक्षा में प्रथम निकल आया, तब क्या हुआ, है तो अन्त को नाई ही।” द्विजों द्वारा दिये गए शूद्रों के ज़ख़्मों के संबंध में प्रिंसिपल साहब बतातें हैं– “आप नहीं जानते। हिंदुओं में रहते हुए नीच जात होने का कलंक आजन्म नहीं छुटता। जिस नगर में मैं रहता हूँ, वहां यदि दस सार्वजनिक सभाएँ होती है तो अपनी योग्यता और सरकारी पद के कारण छः का सभापतित्व मुझे ही पेश किया जाता है, परन्तु हिंदुओं के सामाजिक कार्यों में मेरा व्यक्तित्व मेरे ब्राह्मण चपरासी के जूतों में बैठने लायक भी नहीं। इसी अपमान से बचने के लिए मैंने देश निकाला सा ले रक्खा है। मैं अपनी जन्मभूमि, उत्तर भारत, में नौकरी नहीं कर सकता। आपने शायद डाक्टर सर व्रजेन्द्रनाथ सील का नाम सुना होगा। वे पाश्चात्य दर्शनशास्त्र के बहुत बड़े पंडित हैं। वे माइसोर (मैसूर) विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर थे और शायद ढाई हजार के करीब वेतन पाते थे। दुर्भाग्य से उनकी जात नाई है। उनके पुत्र भी इंडियन एजूकेशन सर्विस में हैं और बम्बई प्रांत के किसी गवर्नमेंट कालेज के प्रिंसिपल हैं। धारवार में उन्होंने मुझसे चार्ज लिया था। उनको उच्च वर्ण के बंगाली हिंदुओं ने ताना मारा कि इंडियन एजुकेशन सर्विस में आ गया तब क्या हुआ, अन्त को है तो नाई ही। बस, इससे उनके हृदय पर ऐसी चोट लगी कि उन्होंने हिंदू-समाज को ही छोड़ देने का निश्चय कर तो लिया। उन्होंने आठ मास की छुट्टी ली, यूरोप गये, और एक फ्रेच लड़की से विवाह कर लाए। उनके बच्चों को न पता है कि जात का इसी प्रकार एक और सज्जन की बात है। अब उन के घर में हिन्दोस्तानी भाषा ही नहीं होती है और ना ही कोई हिंदू उनसे पूछ ही सकता है कि तुम नाई हो या कुछ और। वे समझते हैं कि इस प्रकार हमने कम से कम अपनी संतान को तो द्विजशाही की दासता से मुक्त कर दिया। हमारी तरह उन्हें तो जात का नाम सुनकर लज्जा से सिर न झुका देना पड़ेगा।”

1990 के दशक की शुरुआत में जब सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया तो वह पल शूद्रों के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था. इस कदम ने सरकारी नौकरियों और सरकारी उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ी जातियों – एक श्रेणी जिसमे अधिकतर पारंपरिक रूप से मजदूरी और कारीगरी करने वाली शूद्र जातियां सम्मिलित थीं – के लिए आरक्षण लागू कर दिया. आयोग ने भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था में सबसे दयनीय मानी जाने वाली श्रेणी के रूप में इन चौथी और सबसे निचली जातियों की पहचान की थी. श्रेष्ठतर समझी जाने वाली जातियों के बरअक्स वे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए थे फिर भी उन्हें सकारात्मक पक्षपात की नीति, जिसे आजादी के बाद दलितों और आदिवासियों (अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां) के लिए अपनाया गया था, से बाहर रखा गया था. आयोग ने ऐतिहासिक पिछड़ेपन के आधार पर अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की एक अलग श्रेणी तैयार की. ब्राह्मण और वैश्य जातियों, यहां तक कि शूद्रों के एक तबके ने भी, इस कदम का कड़ा विरोध किया. अपेक्षाकृत रूप से अंत: शूद्र जातियों के शिखर पर आसीन संपन्न जमींदार समूहों जैसे कम्मा, रेड्डी, कापू, गौड़ा, नायर, जाट, पटेल, मराठा, गुज्जर, यादव, इत्यादि जातियां दशकों से खुद ब्राह्मण-बनिया जातियों की आदतों और पूर्वाग्रहों को अपनाने में लगीं थीं. 1996 में प्रकाशित अपनी पुस्तक, मैं हिंदू क्यों नहीं हूं, में मैंने इन ‘उच्च’ शूद्र जातियों का वर्णन नव-क्षत्रियों के रूप में किया था. ये समूह इस भरोसे खुद का संस्कृतिकरण कर रहे थे कि वर्ण व्यवस्था में पारंपरिक रूप से दूसरे स्थान पर आसीन और लगातार क्षय होते, क्षत्रियों का स्थान ले पाएंगे.

मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू हुए ढाई दशक बीत चुके हैं. एक पूरी पीढ़ी बड़ी हो चुकी है. यह वक़्त है पूछने का कि आरक्षण इन शूद्र अन्य पिछड़ी जातियों को कितनी दूर तक लेकर आया है? उच्च शूद्र जातियों, जिन्होंने इस आरक्षण का विरोध किया, का क्या भला हुआ? आज शूद्र भारत में खुद को कहां पाते हैं? भारत की कुल जनसंख्या में शूद्रों की तादाद तकरीबन आधी है – एक ऐसा देश जो जनसंख्या के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर है. अस्सी के दशक में, मंडल आयोग इस नतीजे पर पहुंचा कि भारत में अन्य पिछड़ी जातियों की तादाद, जिसमे उच्च शूद्र जातियां शामिल नहीं हैं, 52 प्रतिशत है. आज की तारीख में यह संख्या 65 करोड़ से अधिक बैठती है, जो अमरीका की जनसंख्या से दोगुना और पाकिस्तान या ब्राजील से तीन गुना है. जबकि अगड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को मिलाकर भी यह कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत से ज्यादा नहीं बैठता.

इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद भी, शूद्रों का प्रतिनिधित्व राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में, चाहे वह सरकार, निजी व्यवसायों, धर्म और शिक्षा में, पर्याप्त नहीं था. राष्ट्रीय स्तर पर तो विशेषतौर पर वे ब्राह्मणों और वैश्यों, खासकर, वैश्यों के अधीन थे. यही बात उच्च शूद्रों के ऊपर भी लागू होती है, जो आज अजीबोगरीब स्थिति में हैं. अन्य पिछड़ी जातियों की सूची में उनका नाम शामिल न किए जाने की वजह रही है उनके द्वारा इस बात पर जोर देना कि उनका अन्य शूद्रों से उच्चतर रूतबा है. इस वक्त लाखों-लाख लोग पूरे देश भर में अवसरों की गतिशीलता में गतिरोध की वजह से गुस्से में हैं और मांग कर रहे हैं कि उन्हें भी अन्य पिछड़ी जातियों की सूची में शामिल किया जाए ताकि वे भी आरक्षण का लाभ उठा सकें.

राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में शूद्र कहां हैं? उनमे सबसे अमीर भी कृषि अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं, जो पारंपरिक रूप से उनकी आय का प्रमुख साधन रहा है. उद्योग और वित्त के क्षेत्र में उन्होने कोई खास तरक्की नहीं की है. इस क्षेत्र पर बनियों का दबदबा रहा है. पूंजी के लिए शूद्रों को उन पर ही हमेशा की तरह निर्भर रहना पड़ता है. व्यवसाय के क्षेत्र में एक भी ऐसा शूद्र परिवार नहीं है जो अंबानियों, अडानियों या मित्तल को चुनौती देता हो. गरीब शूद्र आज भी खेतों, निर्माण स्थलों और फैक्ट्रियों में काम करते हैं जहां रोज नए शूद्र कारीगर शामिल हो रहे हैं क्योंकि आधुनिक उद्योग के जमाने में उनके परंपरागत कौशल का लगातार अवमूल्यन हुआ है. राष्ट्रीय चेतना और संस्कृति में शूद्र कहां बसते हैं? समकालीन भारत में बौद्धिक, दार्शनिक और सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में उनका कोई खास योगदान नहीं रहा है. औरतों की तो रहने ही दीजिए, किसी भी शूद्र मर्द को हिंदू धर्म में किसी भी प्रभावशाली पद पर नहीं आने दिया गया है, हालांकि हर कहीं शूद्रों पर हिंदू धर्म को आक्रमकता के साथ थोपा गया है. भारत के हिंदुओं में सबसे अधिक शूद्रों की संख्या है, लेकिन धर्म के मामलों में उनके मत को तरजीह नहीं दी जाती. खुद शूद्रों में जाति-आधारित पाबंदी इस कदर घर कर गई है कि कोई भी शूद्र पुरोहित बनने की सोचता भी नहीं है. इसके अलावा विरले ही ऐसा कोई शूद्र बुद्धिजीवी होगा, जो उनसे भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में उनके समूह के सामाजिक और राजनीतिक स्थान पर बात कर सके. हद से हद ऐसी शख्सियतें, प्रादेशिक स्तर पर मौजूद हैं और अपनी-अपनी भाषाओं में उनसे संवाद करती हैं लेकिन राष्ट्रीय बहस में वे कभी शरीक नहीं हो पातीं. अकादमिक दुनिया और मीडिया ने भी शूद्र दिमागों को अपने यहां जगह नहीं दी.

शैक्षिक क्षेत्र में शूद्रों ने, कुछ एक अपवादों को छोड़कर, पूरे देश भर में कुछ खास हासिल नहीं किया है. तमाम बौद्धिक और आध्यात्मिक मामलों में वे अधिकतर ब्राह्मणों के नेतृत्व को स्वीकार करते आए हैं. राष्ट्रीय राजनीति और सरकार में शूद्र कहां हैं? उच्च न्यायपालिका और नौकरशाही में उनका प्रतिनिधित्व लगभग ना के बराबर है. सच्चाई तो यह है कि शूद्र नेता अधिक से अधिक प्रादेशिक ताकतें हैं. कुछ उच्च शुद्र जातियों ने बहुत प्रभावशाली तरीके से शक्तिशाली पार्टियों को संगठित किया है. उत्तर प्रदेश और बिहार में यादवों ने, या आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कम्मा, रेड्डी, कापू और वेलम्माओं ने. लेकिन इन पार्टियों और नेताओं का प्रभाव क्षेत्र उनके अपने राज्यों और अधिकतर जाति और कौमपरस्ती तक ही सीमित रहा है. एक व्यापक एकजुटता जुटाने में वे कामयाब नहीं रहे हैं. इन नेताओं के केंद्र में सत्ता के साथ गठजोड़ बनाने के प्रयास उनकी अधीनता का घोतक रहा है और इससे उनके शूद्र घटकों के लिए कोई भी सार्थक फायदा पहुंचना अभी बाकि है. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी राष्ट्रीय पार्टियों में शूद्रों के सरोकारों का कोई खास प्रतिनिधित्व नहीं है, ना ही वे निर्णय लेने वाले पदों पर आसीन हैं. दोनों ही पार्टियों में ब्राह्मणों और बनियों का वर्चस्व है

बी.आर. अंबेडकर ने शूद्र कौन हैं नामक अपनी किताब में 1946 में लिखा था. “इस विषय पर अध्ययन की वर्तमान स्थिति में, शूद्रों के ऊपर किताब को अतिरेकता की संज्ञा नहीं दी जा सकती.” इंडो-आर्यन समाज में वे चौथा वर्ण कैसे बने? नए पुरातत्व और आनुवांशिकी-विषयक अध्ययनों ने उनकी उत्पत्ति के सिद्धांत पर प्रश्न खड़े किए हैं और कि क्या शूद्र वाकई में इंडो-आर्यन थे. लेकिन इसके अलावा शूद्रों पर मिलने वाले अध्ययन की स्थिति इतने सालों में लगभग बिलकुल नहीं बदली है. बिरले ही ऐसे शोधकर्ता होंगे जिन्होंने आजाद भारत में शूद्रों की दुर्दशा पर विशेष रूप से काम किया हो. शूद्रों के इतिहास और संस्कृति पर कोई अच्छी किताब मौजूद नहीं है और मीडिया में भी चुनावी राजनीति के संकुचित दायरे के बाहर शूद्रों से संबंधित कुछ खास देखने को नहीं मिलता. शूद्रों के पास अपनी समस्याओं को लेकर मुड़ कर देखने के लिए खुद के अलावा कोई नहीं है. यहां तक कि अंबेडकर का शूद्रों पर लेखन भी उनके इतना काम नहीं आया जितना उनका अन्य काम अति शूद्रों के, अर्थात उनकी ऐतिहासिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से समूचे देश में मुक्ति आन्दोलन को प्रेरित करना. एकीकृत चेतना के अभाव में, शूद्रों को उसी हिंदू धर्म में शामिल कर लिया गया जो उन्हें बुनियादी रूप से ही नीच समझता है. हिन्दू धर्म उन्हें बड़ी आसानी से ब्राह्मणवादी राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संस्थाओं को स्वीकार्य बनाता है. हमेशा की तरह आज भी शूद्रों के बारे में लेखन को अतिरेकता की संज्ञा नहीं दी जा सकती.

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