जालौर का इतिहास

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जालौर का इतिहास

जालौर के राजा कौन थे, अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर आक्रमण कब किया, जालौर किले का निर्माण कब हुआ, अलाउद्दीन खिलजी ने जालोर दुर्ग का क्या नाम रखा, कान्हड़देव का इतिहास, जालोर का युद्ध, जालोर चौहान इतिहास, जालौर जिला, जालोर की तहसील, जालौर राजस्थान, जालोर की जनसंख्या 2020,

देश के सबसे अजेय किलों में से एक के रूप में माने जाने वाला जलोलर किले के बारे में एक प्रसिद्ध कथानक है आकाश फट जाए , पृथ्वी उल्टा हो जाए , लोहे के कवच को टुकड़ों हो जाए, शरीर को अकेले लड़ना पड़े , लेकिन जालोर समर्पण न करें पारंपरिक हिंदू वास्तुकला शैली में निर्मित, जलोलर किला एक खड़ी पहाड़ी पर 1200 मीटर की ऊंचाई में स्थित है जालोर का किला इतनी ऊँचा था कि पूरे शहर के मनोरम दृश्य के लिए उपयुक्त था।

जालोर फोर्ट का इतिहास :
जालोर किले की वास्तविक निर्माण अवधि अज्ञात है, हालांकि यह माना जाता है कि किला 8 वीं -10 वीं सदी के बीच में बनाया गया था जालोर शहर परमार राजपूतों ने 10 वीं शताब्दी में शासन किया था जालोर का किला 10 वीं सदी का किला है और “मारू” (रेगिस्तान) के नौ महलों में से एक है जो परमार (राजपूत किंग्स के एक वंश) के अधीन था।
यह 1311 में था जब अलाउद्दीन खिलजी, डेल्ही के सुल्तान ने किले पर हमला किया और उसे नष्ट कर दिया। किले के खंडहर पर्यटकों के प्रमुख आकर्षण हैं।

हिन्दू मंदिर :
जालोर किले में एक पुराना शिव मंदिर है जो भगवान् शिव को समर्पित है भगवान् शिव मंदिर का निर्माण जालोर के शासक कनहाद देव ने करवाया था इसी तरह जोधपुर के शासक माह सिंह ने श्री जलंधरनाथ के समाधी मंदिर का निर्माण किया था इसके पश्चात सं 2005 में पवित्र श्री शान्तिनाथजी महाराज ने समाधी मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया जिसमे भक्तो के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध थी किला परिसर में अम्बा माता, आशापुरी और हनुमना की का मंदिर भी मौजूद है।

जबालिपुर या जालहुर सूकडी नदी के किनारे बना यह किला राज्य के सुद्रढ़ किलों में से एक माना जाता हैं इस किले को सोहनगढ एवं सवर्णगिरी कनकाचल के नाम से भी जाना जाता हैं 8 वीं शताब्दी में प्रतिहार क्षत्रिय वंश के सम्राट नागभट्ट प्रथम ने इस किले का निर्माण करवाकर जालौर को अपनी राजधानी बनाया था

जालौर के किले को अभी तक कोई आक्रान्ता इसके मजबूत द्वार को खोल नहीं पाया था जब प्रतिहार शासक जालौर से चले गये तो इसके बाद कई वंशों ने यहाँ अपना राज्य जमाया इस दुर्ग को मारू के नौ किलों में से एक माना जाता हैं इस किले के सम्बन्ध में एक लोकप्रिय कहावत है आकाश को फट जाने दो, पृथ्वी उलटी हो जाएगी, लोहे के कवच को टुकड़ों में काट दिया जाएगा, शरीर को अकेले लड़ना होगा, लेकिन जालोर आत्मसमर्पण नहीं करेगा

जालौर दुर्ग पर शासन –
प्रतिहारों के पराभव के बाद जालौर पर पँवार वंश के शासकों ने अपना आधिपत्य स्थापित किया कुछ समय में परमारों के शासन का अंत कर नाडौल के कीर्ति पाल चौहान ने इस दुर्ग पर अपना शासन स्थापित किया इसी ने जालौर में चौहान वंश के शासन की नींव रखी ! सुन्धा पर्वत अभिलेख (वि.स. 1319) में कीर्तिपाल चौहान को ‘राजेश्वर’ कहा गया है
चौहान शासक कीर्तिपाल के वंशज ही आगे चलकर सोनगरा चौहान कहलाये जालौर दुर्ग के साथ विशेषतौर पर इन सोनगरा चौहानों के शौर्य और वीरता एवं बलिदान के पराक्रम की गाथाएँ जुड़ी हुई हैं जो इतिहास में स्वर्णाक्षरों के रूप में दर्ज हैं इस दुर्ग पर समय-समय पर प्रतिहारों एवं परमारों के अलावा चालुक्य (सोलंकी) चौहानों, राठौड़ों, दिल्ली के मुस्लिम सुलतानों, मुगलों आदि का आधिपत्य रहा |

जालौर में चौहान वंश की स्थापना :
जालौर का प्राचीन नाम जबालिपुर था जबालिपुर पर आरम्भ में शासन प्रतिहारों ने किया था प्रतिहार यहाँ पर शासन करने के बाद कन्नौज चले गये थे।
जालौर में चौहान वंश की स्थापना 1182 ई. में कीर्तिपाल ने की थी कीर्तिपाल की उपाधि थी- ‘‘कीतू एक महान राजा’’, यह उपाधि इसको जोधपुर के जसवन्त सिंह के दीवान मुहणौत नैणसी ने दी थी कीर्तिपाल ने जालौर में जांगलेश्वमर महादेव का मन्दिर बनवाया था।

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