राजा अमरसिंह राठौड़ कौन थे

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राजा अमरसिंह राठौड़ कौन थे

राजा गज सिंह मुगल शासक शाहजहां के अधीन मारवाड़ क्षेत्र के शासक थे उनके पुत्र अमरसिंह राठौड़ एक महान योद्धा और एक देशभक्त थे लेकिन उनके पिता ने उन्हें मुगलों से एक डाकू को बचाने के कारण राज्य से निर्वासित कर दिया था बाद में वह शाहजहां की दिल्ली सल्तनत में शामिल हो गए जहाँ उन्होंने शाहजहां को अपनी वीरता से प्रभावित किया जिससे उन्हें नागौर का जागीरदार बनाया गया हालांकि सम्राट के भाई सलाबत खान राज्य में अमर सिंह राठौड़ के उत्थान से जलते थे और अमर सिंह को बदनाम करने का अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे उन्हें जल्द ही यह मौक़ा मिल गया जब अमर सिंह की अनधिकृत अनुपस्थिति के बारे में कुछ छोटी-छोटी बातों के बारे में पता चला सलाबत खान ने एक मुद्दे के रूप में इसे इतना बढ़ा दिया कि शाहजहां ने सलाबत को अमर सिंह को दंड देने का आदेश दिया इसका फायदा उठाते हुए सलाबत ने अमर सिंह को धमका कर उसी वक्त दंड का भुगतान करने को कहा सलाबत ने यह भी चेतावनी दी कि वह अमर सिंह को बिना दंड का भुगतान किये उन्हें जाने नहीं देगा ।

अमरसिंह राठौड़ का इतिहास :-
अमर सिंह ने मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के भरे दरबार में ऐसा कारनामा किया था कि ये ख़बर पूरे देश में पहुँची और उनके सहस को देख कर इस्लामिक आक्रांता थर्रा उठे इस घटना के बारे में विस्तार से बताने से पहले अमर सिंह के बारे में बताना ज़रूरी है वो राठौड़ राजवंश के राजा गज सिंह प्रथम के पुत्र थे गज सिंह को ‘दलथम्मन’ भी कहा जाता था ये उपाधि उन्हें तत्कालीन मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने दी थी गज सिंह की मृत्यु के बाद अमर सिंह बड़ा पुत्र होने के बावजूद मारवाड़ के सिंहासन पर नहीं बैठ पाए सत्ता उनके छोटे भाई जसवंत के साथ में गई अमर सिंह उनलोगों की नज़र में काफ़ी उद्दंड थे।
उन्हें मारवाड़ से निकाल दिया गया और वो मुगलों के पास गए शाहजहाँ ने उन्हें नागौर की जागीर दी लेकिन अमर सिंह स्वतंत्र विचारों वाले और स्वाभिमानी किस्म के व्यक्ति थे मारवाड़ में भले ही वो राजा नहीं बन पाए लेकिन वो राजा से भी ज्यादा लोकप्रिय थे दक्षिण में उनके पिता ने जितने भी युद्ध लड़े थे उसमें अमर सिंह ने अदम्य सहस और पराक्रम दिखाया था फिर भी बाहर निकाले जाने पर उन्होंने आगरा के मुग़ल दरबाद में शरण ली उनके साथ राठौड़ राजवंश के कई अन्य लोग भी अगवा आए।

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लोकप्रिय संस्कृति में स्मरण :-
अमर सिंह राठौड़ को असाधारण शक्ति इच्छा और स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता है न ही डर न ही लालच अपने फैसले को प्रभावित करने में सक्षम थे वह एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में अमर सिंह राठौर वीरगति को प्राप्त हुए और बल्ला चंपावत की बहादुरी अभी भी राजस्थान में लोकगीतों और आगरा के आसपास याद है अमर सिंह पर आधारित एक हिंदी फिल्म 1 970 में वीर अमर सिंह राठौड़ नामक फिल्म बनाई गई थी और राधाकांत द्वारा निर्देशित थी देव कुमार, कुमकुम और ज़ब्बा रहमान, ब्लैक एंड व्हाईट में फिल्म के प्रमुख अभिनेता थे एक गुजराती फिल्म को एक ही विषय पर बनाया गया था और मुख्य भूमिका गुजराती सुपर स्टार उपेंद्र त्रिवेदी ने की थी आगरा के किले का एक द्वार उन्हें अमर सिंह गेट के रूप में नामित किया गया जो आगरा में एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है।

दिल्ली दरबार में सलावत खां का सर काटने वाले अमरसिंह राठौड़ :-
सलावत खां पर उस समय ‘फीलचराई’ को लेकर अमरसिंह राठौड़ को अपमानित करने का भूत सवार था इसलिए उसने अमरसिंह के मुगल राजदरबार में उपस्थित होने पर उसे उत्तेजित करना आरंभ कर दिया उसने उत्तेजक शब्दों का प्रयोग करना भी प्रारंभ कर दिया और अमरसिंह जी अपशब्द बोलने लगा इस पर बादशाह भी मौन था इसलिए उस स्वाभिमानी वीर अमरसिंह राठौड़ का क्षत्रिय रक्त उबाल मारने लगा और उन्होंने एक ही झटके में अपनी तलवार से सलावत खां का सर धड़ से अलग कर दिया एकाएक हुवे इस वाकिये से सभी दरबारी सकपका गये और पुरे दरबार में भगदड़ मच गई बादशाह शाहजहां भी दरबार छौड़ भाग गया।

अमरसिंह का चरित्र चित्रण :-
अमरसिंह राठौड़ के विषय में डा. हुकुमसिंह भाटी ने अपनी पुस्तक ‘वीर शिरोमणि अमरसिंह राठौड़’ में लिखा है :-”राजस्थान की इस धरती पर वीर तो अनेक हुए हैं-पृथ्वीराज चौहान, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़ आदि पर अमरसिंह की वीरता एक विशिष्ट थी, उसके शौर्य में पराक्रम की परकाष्ठा के साथ रोमांच के तत्व भी विद्यमान थे उसने अपनी आन बान रखने के लिए 31 वर्ष की आयु में ही इहलीला समाप्त कर ली आत्मसम्मान की रक्षार्थ मर मिटने की इस घटना को जन जन का समर्थन मिला सभी ने अमरसिंह के शौर्य की सराहना की साहित्यकारों को एक खजाना मिल गया उन्होंने अमरसिंह के आदर्शों का गुणगान करने के लिए डींगलगीत, कविता, दोहे, झमाल जिलों का, ऊबाका और बात अनेकों रचनाएं रच डालीं रचना धर्मियों के साथ ही कलाकारों ने एक ओर जहां कठपुतली का मंचन कर अमरसिंह की जीवनगाथा को जनजन में प्रदर्शित करने का उल्लेखनीय कार्य किया, वहीं दूसरी ओर ख्याल लेने वालों ने अमरसिंह के जीवन मूल्यों का अभिनय बड़ी खूबी से किया रचना धर्मियों और कलाकारों के संयुक्त प्रयासों से अमरसिंह जनजन का हृदय सम्राट बन गया।”
राव अमरसिंह राठौड़ जैसे वीर योद्घा के लिए श्री भाटी का यह कथन उचित ही है उसने अपने जीवन में वह कार्य किया जिसका गुणगान भारत की आने वाली पीढिय़ां युग-युगों तक गायेंगे अब हम उसके जीवन के उसी पक्ष पर चलते हैं जिसके कारण अमरसिंह राठौड़ ‘अमरसिंह राठौड़’ बना।

अमरसिंह राठौड़ का जीवन :-
उन दिनों मुगल वंश के बादशाह शाहजहां का शासन था उसके शासनकाल को महिमामंडित करते हुए कई इतिहासकारों ने ‘स्वर्णयुग’ तक कह दिया है और भारत से इस स्वर्णयुग पर गर्व करने की अपनी एक पक्षीय संस्तुति भी आरोपित कर दी है।
शाहजहां की हिंदुओं के प्रति नीति में कोई परिवर्तन नही आया था उसने भी हिंदुओं के प्रति अपनी उसी परंपरागत नीति का पालन किया जो उसके पूर्ववर्ती मुगल शासक करते आये थे कई स्थानों पर हिंदू को हिंदू से लड़ाकर अपना स्वार्थ सिद्घ कर जाने की बातें इस बादशाह की ओर से भी की गयीं।
इस बादशाह के भीतर अपने मित्रों सहयोगियों और विश्वास पात्रों के प्रति भी शंका आशंका के बादल उतनी ही शीघ्रता से उमड़ते-घुमड़ते और बरसते थे जितनी शीघ्रता से अन्य मुस्लिम शासकों के हृदय में ऐसी विनाशकारी मचलन उत्पन्न करते थे।

नोट > राजा अमरसिंह राठौड़ की ऐतिहासिक जानकारी काफी विस्तृत है हमने अपने इस पोस्ट में मुख्य पहलुओं पर ही जानकारी दी है फिर भी कोई महत्वपूर्ण जानकारी छूट गयी है तो हम उसके लिए क्षमाप्रार्थी हैं।

राजस्थान के सम्राट

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